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हिन्दी सिनेमा में स्त्री का बदलता स्वरूप

हिन्दी सिनेमा में स्त्री का बदलता स्वरूप


कहते है कि सिनेमा समाज का दर्पण है, जिसमें समाज का प्रतिबिंब नजर आता हैं। समय कभी भी ठहरता नहीं है और जो समय के साथ कदम-से-कदम मिला कर बढ़े वही समाज के हित के लिए होता है। शुरू से ही सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन मात्र ही नहीं रहा है अपितु यह समाज में फैली बुराइयों को समाज से ही अवगत कराता है। जिस प्रकार समाज मेें बदलाव आए है, ठीक उसी प्रकार सिनेमा में भी कई बदलाव आए है फिर चाहे वो भाषा, दर्शक वर्ग, पसंद-नापसंद, वेश-भूषा आदि हो। इसके साथ ही सबसे अहम बदलाव आया है, वह है सिनेमा में स्त्री का स्वरूप और इस बदले स्वरूप को दर्शकों का भी प्यार मिला हैं।

नए समय के हिंदी सिनेमा में औरत की शख्सियत की वापसी हुई है। औरत की इस वापसी, उसके जुझारूपन को दर्शकों ने हाथोंहाथ लिया है। दर्शक अब अस्सी-नब्बे के दशक की शिफॉन साडिय़ों की फंतासी से बाहर निकल कर यथार्थ की खरोंचों को महसूस करना चाहता है। वह आईने में अपने को देखना चाहता है।


अब की फिल्मों में औरत की स्वतंत्रता, इच्छाओं के साथ समाज की रुढिय़ों का खुल का विरोध भी देखने को मिलने लगा है। इस कड़ी में अगर क्वीन  की रानी का जिक्र न हो तो यह चर्चा अधूरी मानी जाएगी। क्वीन जहां स्त्री स्वातंत्र्य और स्त्री अस्मिता से जुड़े पहलुओं को समझाने का प्रयास करती है कि कैसे एक आम लड़की के कमजोर होने, बिखरने और फिर संभलने की कहानी को दर्शाती हैं। फिल्म में यूरोप की यात्रा हर उस स्त्री के अस्तित्व और मानवीय गरिमा की यात्रा है, जिसे पितृसत्तात्मक व्यवस्था ने सदियों से चिर शिशु बना कर रखा है। क्वीन इसी चंगुल से आजाद होने की कहानी को फिल्म में दिखाया है।

हंसी तो फंसी, हाइवे, अंजाना-अंजानी, बैंड बाजा बारात आदि ने नई नारी के चरित्रों को नया आयाम और परिभाषा दी है। जहां वह अपना जीवन खुलकर जीती है। उसे इस बात की कोई परवाह नहीं है की उसे लोग क्या कहेंगे? वह तो बिन्दास होकर जीती है।

एक समय था जब बिन ब्याही मां बनना, लिव-इन-रिलेशन में रहने का ऐलान करना समाचार पत्र से लेकर टी.वी. चैनलों तक हंगामा मचा देता था। लेकिन बदलते दौर में स्त्री की भूमिका समाज में बेहतर हुई है। वह समाज के हर क्षेत्र में अपनी जगह बनाने के साथ-साथ उन सारी चुनौतियों का सामना करने में भी सक्षम हैं जो हमेशा से पुरुष वर्ग निभाते आए हैं। लुका-छुपी, चक दे इंडिया,  नीरजा, मैरीकॉम, मेंहदी जैसी फिल्मों ने सिनेमा में स्त्री चरित्रों को मजबूत बनाया है।

बदलते दौर में सिनेमा ने सामाजिक धरातल पर लड़कियों और औरतों संबंधी विचारधारा को बदला, जीवन  में जहां वह घर तक सीमित थी वह बाहर निकल कर मीडिया, प्रबन्धन चिकित्सा, अनुसंधान, अध्ययपन, खेलकूद, कानून, सिनेमा जैसे क्षेत्रों में अपना पाव ही नहीं जमाया बल्कि उसके लिए नए विचारों का आदान-प्रदान भी किया। फैशन, हीरोइन, डिअर जिन्दगी आदि ऐसी फिल्में है जिनमें नारी का सशक्त चित्रण दर्शक वर्ग को देखने को मिलता है।

यह पुरानी धारणा रही है कि एक बार राह बदल लेने के बाद खास कर अभिनेत्रियों के लिए मुख्य धारा में लौट पाना लगभग असंभव हो जाता है, लेकिन आज के बदले माहौल में कई ऐसी अभिनेत्रियां हैं, जो नायिका के साथ खलनायिका की भूमिका निभाने से भी गुरेज या परहेज नहीं कर रही हैं। खास बात तो यह है कि जितनी तालियां इन्हें पॉजीटिव रोल्स के लिए मिलती हैं, उससे ज्यादा निगेटिव रोल्स के लिए मिल जाती हैं। वर्ष 2014 में आई गुलाब गैंग में जूही चावला उसी तरह कू्रर नेता के रूप में सामने आई, जैसी भूमिका वर्ष 2013 में शबाना आजमी ने मटरू की बिजली का मंडोला में की थीं।

अब वह समय नहीं रहा जब फिल्में नायक प्रधान हुआ करती थी, बल्कि अब के समय में नायिका प्रधान फिल्मों की भी उतनी ही प्रशंसा होती है जितनी नायक प्रधान की। स्त्री पात्रों को नायक के रूप में प्रस्तुत करने वाली इन फिल्मों की स्त्रियां अपने शर्म और संकोच की कैद से निकल जाती हैं। ये तथाकथित सभ्रांत समाज से बेपरवाह होकर ठहाके लगाती, चीखती, जोर-जोर से गाती और तब तक नाचती हैं, जब तक कि उनका मन नहीं भर जाता।

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