Skip to main content

भारतीय आयुर्विज्ञान काढ़े तक ही सीमित है?

facebook, google+

भारतीय आयुर्विज्ञान काढ़े तक ही सीमित है?

कोविड महामारी को 1 साल से अधिक समय हो गया है और ये भी स्पष्ट हो चुका है कि कोविड विषाणु देश काल के अनुसार अपनी संरचना बदलते हुए मारक बना हुआ है। इसके नियंत्रण के लिए देश काल के अनुसार प्रोटोकाॅल की जरूरत है। कोरोना संक्रमण के तेज फैलाव और इसके वैश्विक महामारी बनने के पीछे आवागमन के साधनों का विकास जिसके कारण पूरा विश्व एक प्रांत की तरह होना भी है।

आयुर्वेद शब्द (आयु: + वेद) से मिलकर बना है जिसका अर्थ है जीवन से संबंधित ज्ञान। आयुर्विज्ञान मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त  करने तथा आयु बढ़ाने वाला है। आयुर्वेद के आदि आचार्य अश्विनी कुमार माने जाते है। धनवंतरी जयंती या धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस मनाया जाता है। धनवंतरी जी को सनातन धर्म के अनुसार औषधि का देवता माना जाता है।

आयुर्वेद के आचार्यो ने महामारी का मुख्य कारण जलवायु प्रदूषण को बताते है। जिससे अनाज,फल,सब्जियों और औषधियों वनस्पतियों के गुण कम हो जाते है। जल एवं वायु जीवन का प्रमुख आधार है इसलिए पर्यावरण में जलवायु के विकृत होने पर मानव शरीर का कफ, वात तत्व कमजोर हो जाता है। यही कारण है कि आम जनता के साथ समृद्ध राजपुरूष भी महामारी का शिकार बनने लगे है।



भारतीय संस्कृति के सभी पर्वो पर हवन,सफाई ऋतु अनुकूल पकवानों के साथ कुल,ग्राम देवताओं के उपासना की परंपरा रही है। परंतु आज सांस्कृतिक संक्रमण काल में पश्चात्य शैली के कारण परंपराओं को पिछड़ापन का प्रतीक और ढोंग समझकर हम त्याग चुके है। कमजोर इम्युनिटी का एक कारण ये भी सिद्ध हो रहा है। इन्ही कारणों से अति विकसित संसाधनों के बावजूद कोरोना काल में हम असहाय बने हुए है।

आयुर्वेद में रसायन उन औषधियों को कहा जाता है जिनके सेवन से मेधा और शरीर आराेग्य होता है। इसे आम बोलचाल की भाषा में एंटीऑक्सीडेंट एवं इम्युनिटी बूस्टर कहा जाता है। आयुर्वेद के अनुसार  इम्युनिटी दो प्रकार की होती है। सत्वबल एवं ओजबल। महामारी काल मे चारो तरफ से नेगेटिव सूचनाओं के कारण व्यक्ति का मनोबल कमजोर हो जाता है।

मनोबल कमजोर होने की वजह से लोग डिप्रेशन में चले जाते है। सत्वबल अर्थात मनोबल बढ़ाने के लिए ही उपासना,पूजा,ध्यान आदि के लिए कहा जाता है। इम्युनिटी  के दूसरे पक्ष् को ओज कहा जाता है। देह,मन और आत्मा के संयुक्त शक्ति को ओजबल कहा गया है।

आयुर्वेद में आचार्य नागार्जुन को महामारी नियंत्रण व चिकित्सा का विशेषज्ञ माना जाता है। कहा जाता है कि एक बार मगध प्रांत में महामारी आई और वर्षा न होने के कारण फसलें,जड़ी बूटियां भी सूख गई थी। इस संकट से निपटने के लिए मगध नरेश ने नालंदा विश्वविद्यालय में आचार्यों का सम्मेलन आयोजित किया। अपनी बारी आने पर नागार्जुन ने कहा कि वनस्पतियां नष्ट हो चुकी है इसलिए धातुओं-खनिजों की औषधियों से ही महामारी को नियंत्रित किया जा सकता है। नागार्जुन द्वारा दिए गए सूत्र,पारा एवं स्वर्ण आदि धातुओं के भस्म से बनी औषधियों से महामारी पर नियंत्रण संभव हो सका।

आचार्य नागार्जुन के गहन शोध से बनाई गई रसायन औषधियों का प्रयोग आवश्यक है। परंतु खेद है कि आज हम अपने देश के आचार्यो और विद्वानों की परंपराओं की उपेक्षा कर वैश्विक प्रोटोकॉल पर अधिक विश्वास कर रहे है।

दुर्योग से पाश्चात्य जगत के अप्रमाणिक उपायों और दवाओं की असफलता के बावजूद उनका लगातार प्रयोग किया जा रहा है, वहीं हजारों वर्षों की अनूभूत आयुर्वेद की औषधियों पर प्रश्न चिन्ह खड़ा किया जा रहा है और अप्रमाणिक बताकर भारतीय आयुर्विज्ञान को काढ़े तक सीमित कर दिया गया है।



काली मिर्च औषधीय गुणों से भरपूर है, इसमें रोगाणुरोधी गुण मौजूद होते है जो सर्दी-खांसी का उपचार करते है। तुलसी में एंटी-बैक्टीरियल गुण मौजूद होते है जो सभी प्रकार के इंफेक्शन से शरीर की रक्षा करती है। काली मिर्च और तुलसी का काढ़ा ना सिर्फ आपकी इम्यूनिटी बढ़ाएगा बल्कि सर्दी-जुकाम से राहत भी दिलाएगा। इस काढ़े को अपने घर में असानी से बना सकते है।

   रेसिपी

  1. 5 से 6 तुलसी के पत्ते
  2. आधा चम्मच  इलायची पाउडर
  3. काली मिर्च पाउडर, अदरक और मुन्नका
  4. इस तरह बनाएं काढ़ा

एक पैन में दो ग्लास पानी डाले और इसमें इलायची पाउडर, काली मिर्च, अदरक और मुन्नका डालकर 15 मिनट तक उबाले। उबालने के बाद इसे ठंडा होने के लिए रख दें। फिर इसे छान कर पी लें।

कोरोना से लड़ना है तो आपको अपनी इम्यून पावर मजबूत करनी होगी। इस काढ़े के इस्तेमाल से आपकी रोगप्रतिरोधक क्षमता बढ़ेगी, साथ ही आपका पाचन दुरूस्त रहेगा।

आखिर में एक छोटा सा सवालइम्यूनिटी बढ़ाने वाले बोर्नवीटा, बूस्ट, हॉरलिक्स और कॉमप्लैन जैसे पेय पदार्थ कहां चले गए?

क्यों टिकी है तुलसी, गिलोय, काढ़ा व च्यवनप्राश पर जीवन की आस?

कितनी चिड़िया उड़े आकाश, चारा है धरती के पास


Comments

Popular posts from this blog

Global Warming effect on Amarnath Shivling : अमरनाथ शिवलिंग पर ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव

facebook, twitter, अमरनाथ शिवलिंग पर ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग का असर न केवल यूरोप तक सीमित है, बल्कि अब इसका असर भारत में अमरनाथ गुफा तक भी पहुंच रहा है। जिसके कारण अमरनाथ का शिवलिंग वक्त से पहले पिघल रहा है। हर साल करीब एक महीने के लिए अमरनाथ के शिवलिंग के दर्शन होते थे। वहीं अब पिछले कुछ वर्षो से शिवलिंग बहुत जल्दी पिघलने लगा है, जिससे बाबा बर्फानी के दर्शन वाले दिन घटकर सिर्फ 20 दिनों में सिमट रहा है। ये भी पढ़े :  Chardham: pilgrimage or tourist destination चारधाम : तीर्थस्थल या पर्यटनस्थल अमरनाथ यात्रियों के लिए बर्फ के शिवलिंग के दर्शन और दुलर्भ होता जा रहा है। क्योंकि जो शिवलिंग पहले एक महीने तक नहीं पिघलता था, अब वह यात्रा शुरू होने के मात्र 3 हफ्ते के अंदर ही पिघलने लगा है। साल-दर-साल कम होता गया शिवलिंग का आकार आपको जानकर हैरानी होगी कि जो शिवलिंंग 90 के दशक में 20 फीट तक ऊंचा बनता था। लेकिन 2012 में इसकी ऊंचाई 18 फीट तक पहुंच गई। तो वहीं 2015 में अमरनाथ धाम में 18 फीट का शिवलिंग बना। 2016 तक आते-आते शिवलिंग की ऊंचाई 10 फीट तक सिमट गई। उस...

अक्षय तृतीया में क्या न करें, जिससे हो मां लक्ष्मी की कृपा

facebook, twitter, अक्षय तृतीया में क्या न करें, जिससे हो मां लक्ष्मी की कृपा अक्षय तृतीया का दिन सबसे शुभ दिनों में से एक माना जाता है। इस दिन बिना मुहूर्त देखे शादी, मुंडन, घर - गाड़ी की खरीदारी, गृह प्रवेश, नए काम की शुरूआत जैसे शुभ काम किए जाते है। इस दिन किसी भी चीज की खरीदारी करने के लिए बेहद शुभ माना जाता है। इस साल अक्षय तृतीया 3 मई को मनाई जाएगी। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया और आखा तीज के नाम से जाना जाता है। ये भी पढ़ें -  अक्षय से पहले ये सितारे भी एड के लिए मांग चुके है माफी अक्षय तृतीया के दिन कई लोग दान धर्म करते है। इसका बहुत बड़ा महत्व है, ऐसा माना जाता है कि इस दिन दान-पुण्य करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। इसके साथ ही जीवन के सभी दुख दूर होते है। जिस कारण घर में धन-धान्य की कमी भी नहीं होती है, और साथ ही भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का आशीर्वाद बना रहता है। ये भी देखें -  #AkshayTritiya | अक्षय तृतीया में क्या न करें | कब है अक्षय तृतीया अगर आप चाहते है कि आपके घर-परिवार में मां लक्ष्मी का वास सदैव बना रहे इसके लिए आपको अक्षय तृतीया ...

पर्यावरण संरक्षण : अभी नहीं तो कभी नहीं

facebook, twitter, पर्यावरण संरक्षण : अभी नहीं तो कभी नहीं सिर्फ पृथ्वी पर ही जीवन संभव है। Only One Planet In The Entire Universe ... उसे बचाना ही होगा। आज हम विश्व पर्यावरण दिवस की 50 वीं सालगिरह बना रहें है। पांच दशक पहले स्टॉकहोम में साल 1972 में 5 से 16 जून तक पर्यावरण पर दुनिया का पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ था। उसके दो साल बाद 5 जून 1974 में दुनिया के 119 देश प्रकृति को बचाने और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों को हल करने की भावना से एकजुट हुए, और तब पहली बार 'केवल एक पृथ्वी' Only One Earth के स्लोगन के साथ पर्यावरण दिवस मनाया गया। ये भी पढ़े :  इलेक्ट्रिक वाहन : ग्लोबल वार्मिंग की समस्या का समाधान पर्यावरण दिवस मनाने का लक्ष्य पर्यावरण को बचाने की चुनौती से निपटने के लिए एक बुनियादी सामूहिक दृष्टिकोण बनाना था। तब से हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के रूप नामित किया गया। आज हमारी पृथ्वी संकट में है, इसका सुरक्षा कवच यानी ओजोन लेयर छिन्न-भिन्न हो गई है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में प्राकृतिक आपदाओं की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। जिसका असर हमा...